आज कुछ लोग डॉ. संजय कुमार निषाद जी के मंत्री बनने को लेकर यह कह रहे हैं कि वे सत्ता की “मलाई” खा रहे हैं। मेरा सवाल है—क्या किसी समाज का नेता मंत्री बन जाए तो उसके पद को केवल “मलाई” कहकर उसकी पूरी राजनीतिक और सामाजिक भूमिका को खारिज कर देना उचित है?
अगर मंत्री पद ही “मलाई” है, तो यही कसौटी हर दल और हर मंत्री पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। सत्ता में अलग-अलग समय पर कांग्रेस, सपा और बसपा के नेता भी मंत्री रहे हैं और आज केंद्र व प्रदेश सरकारों में अनेक जनप्रतिनिधि मंत्री के रूप में संवैधानिक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इसलिए किसी एक व्यक्ति या एक समाज के प्रतिनिधि के मंत्री बनने पर ही “मलाई” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना उचित राजनीतिक विमर्श नहीं है।
मंत्री बनना अपने आप में न उपलब्धि का अंतिम प्रमाण है, न दोष का। असली सवाल यह होना चाहिए कि मंत्री बनने के बाद उस व्यक्ति ने अपने विभाग, जनता और जिस समाज की आवाज उठाने का दावा किया है, उसके लिए क्या किया?
डॉ. संजय कुमार निषाद जी उत्तर प्रदेश सरकार में मत्स्य विभाग के कैबिनेट मंत्री हैं। इसके साथ ही वे निषाद, मछुआरा और उनसे जुड़े समाज के अधिकारों तथा आरक्षण के प्रश्न को सार्वजनिक और राजनीतिक मंचों पर लगातार उठाते रहे हैं।
हमारी बात बिल्कुल स्पष्ट है—
पद मिला है तो जिम्मेदारी भी मिली है।
सत्ता में भागीदारी मिली है तो समाज की आवाज सत्ता तक पहुंचाने का अवसर भी मिला है।
डॉ. संजय निषाद जी अपने समाज के मुद्दों को सदन, सरकार और सार्वजनिक मंचों तक पहुंचा रहे हैं। उनके काम पर सवाल पूछिए, नीतियों पर बहस कीजिए, उपलब्धियों और कमियों का तथ्यात्मक मूल्यांकन कीजिए—यह लोकतंत्र का अधिकार है। लेकिन केवल मंत्री बनने को “मलाई खाना” बताकर पूरी सामाजिक लड़ाई को छोटा कर देना उचित नहीं है।
और यदि “मलाई” वाली भाषा ही इस्तेमाल करनी है, तो फिर सवाल किसी एक डॉ. संजय निषाद से नहीं, हर दौर की हर सरकार और हर मंत्री से समान रूप से पूछा जाना चाहिए।
हमारे लिए मंत्री पद मंजिल नहीं है—समाज के हक, सम्मान और संवैधानिक अधिकार की लड़ाई महत्वपूर्ण है।
पद से बड़ा समाज है, सत्ता से बड़ा अधिकार है और राजनीति से बड़ा न्याय है।
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